05-03-2009, 03:48 PM
विश्व के लोकतंत्रात्मक देशो के मुखिया भारत मई चुनाव का बिगुल बज चुका है. सभी दल अपने अपने पक्ष में जोर शोर से प्रचार कर रहे है. विगत वर्षों में देखा गया है की कोई भी राष्ट्रीय पार्टी अपना प्रभाव नही जमा प् रही है.अब तक सबसे अधिक समय तक जिस पार्टी ने शासन किया वो कांग्रेस है परन्तु वह भी वंशवाद के कारण अपनी राष्ट्रीय पहचान खोटी जा रही है.तथा कई प्रान्तों में छोटी छोटी क्षेत्रीय पार्टियो से भी पिछड़ रही है और इसीबौखलाहट में गद्दी प्राप्त करने के लिए साम, दाम, दंड, भेद अपना रही है और बेमेल गठबंधन कर रही है. पिछले लोक सभा चुनाव में भी भिन्न विचारो वाले दलों से गठबंधन किया परिणामस्वरूप वामपंथी और बिमान बरषत नेताओ और क्षेत्रियो दलों के दबाव में सरकार चलाई और देश को अच्छा शाशन देने में नाकामयाब रही.
यूं पी ऐ के घटक संसद में तो समर्थन देते magar संसद के बाहर उसी बिल का जोरdaar विरोध कर आन्दोलन करते par सरकार asahaay होकर कुछ नही karसकती थी. कुर्सी के लोभ mein देश को गर्त mein ले गए. मंगहाई आज सुरसा के मुह की तरह बदती ही जा रही है और आम आदमी को दो वक्त की दल रोटी भी नसीब नही हो रही है.
हमारे प.म. वित्विशेश्य है मगर ब्याज दरो की बदती तेज रफ्तार को रोकने में असमर्थ रहे है. जिस यक्ति ने दो हजार चार में ७प्रतिशत ब्याज डर पर मकान ऋण लिया उसे आज १३-१४% के डर से ऋण चुकाना पड़ रहा है. इलेक्शन कैम्पेन में चल रहे आरोप प्रत्यारोपों के सिलसिले से मतदाता थक चुके है. वे चुनाव में दलों से अगले ५ सालो का प्लान कहते है लेकिन उस योजना को सामने रखने की बजाय सभी नेता चुनावी सभाओ में, अपने घोषणा पत्रों मई झूटे वायदे और सभी वेर्गो में जाती, वर्ण धर्म समानता की बात करते हुए देश को प्रगति की और ले जाने का सपना दिखाते हैं जबकि चुनाव में उम्मीदवारी से लेकर मंत्रिपद और शासन के ढाँचे तक में ,जातिगत, संकीर्ण लोग ही बिठाए जाते है जब जब आराखन की आग भड़कती है तब तब भी सभी ने समन्वय बिठाने कीबज्जाय भड़कीले भाषण दे दे केर इन्हे और सुलगाया जाता है. इसके चलते भारत एक धर्म निर्पेक्ष्य लोकतंत्र की बजे जाती सापेक्ष्य अलोक्तंत्र बनता जा रहा है और विश्व मानचित्र पर इस महान लोकतांत्रिक देश की छवि बिगड़ती जा रही है.
हम सबसे पहले भारतीय है, इसे भूलकर जाती धर्म वर्ग सम्प्रदाय क्षेत्रों में बुनत कर टुकड़े टुकड़े हो गए है पूर्ण मानव ही नही रहे.
[ तंत्र में नदारद गाँव- भारत गांवों में बसता है लेकिन चुनाव के समय गाँव अदृश्य हो जाते हैं जिस से क्षेत्रीय पार्टियाँ अपना प्रवाह बढ़ा रही हैं जो एक स्थाई सरकार के लिए खतरा है इन क्षत्रिय दलों के प्रभाब से गठबंधन सरकार को कोई भी बिल संसद में पास करना ही होता है इनके कारन संसद में विपक्षी सांसदों की कम उपस्थिति या मुखबंद प्रक्रिया है अतः हर हाल में संसद सांसदों किउपास्थिति तय होनी चाहिए
इसलिए इस लोकसभा चुनाव में हर मतदाता को अपने मताधिकार का प्रयोग तो करना ही है साथ ही राष्ट्रीय दलों को चुनकर देश को सुदृढ़ पक्ष और विपक्ष देना है ताकि ये विशाल लोकतंत्र सही तौर पर प्रगति कर सके
जय हिंद-जय लोकतंत्र।
यूं पी ऐ के घटक संसद में तो समर्थन देते magar संसद के बाहर उसी बिल का जोरdaar विरोध कर आन्दोलन करते par सरकार asahaay होकर कुछ नही karसकती थी. कुर्सी के लोभ mein देश को गर्त mein ले गए. मंगहाई आज सुरसा के मुह की तरह बदती ही जा रही है और आम आदमी को दो वक्त की दल रोटी भी नसीब नही हो रही है.
हमारे प.म. वित्विशेश्य है मगर ब्याज दरो की बदती तेज रफ्तार को रोकने में असमर्थ रहे है. जिस यक्ति ने दो हजार चार में ७प्रतिशत ब्याज डर पर मकान ऋण लिया उसे आज १३-१४% के डर से ऋण चुकाना पड़ रहा है. इलेक्शन कैम्पेन में चल रहे आरोप प्रत्यारोपों के सिलसिले से मतदाता थक चुके है. वे चुनाव में दलों से अगले ५ सालो का प्लान कहते है लेकिन उस योजना को सामने रखने की बजाय सभी नेता चुनावी सभाओ में, अपने घोषणा पत्रों मई झूटे वायदे और सभी वेर्गो में जाती, वर्ण धर्म समानता की बात करते हुए देश को प्रगति की और ले जाने का सपना दिखाते हैं जबकि चुनाव में उम्मीदवारी से लेकर मंत्रिपद और शासन के ढाँचे तक में ,जातिगत, संकीर्ण लोग ही बिठाए जाते है जब जब आराखन की आग भड़कती है तब तब भी सभी ने समन्वय बिठाने कीबज्जाय भड़कीले भाषण दे दे केर इन्हे और सुलगाया जाता है. इसके चलते भारत एक धर्म निर्पेक्ष्य लोकतंत्र की बजे जाती सापेक्ष्य अलोक्तंत्र बनता जा रहा है और विश्व मानचित्र पर इस महान लोकतांत्रिक देश की छवि बिगड़ती जा रही है.
हम सबसे पहले भारतीय है, इसे भूलकर जाती धर्म वर्ग सम्प्रदाय क्षेत्रों में बुनत कर टुकड़े टुकड़े हो गए है पूर्ण मानव ही नही रहे.
[ तंत्र में नदारद गाँव- भारत गांवों में बसता है लेकिन चुनाव के समय गाँव अदृश्य हो जाते हैं जिस से क्षेत्रीय पार्टियाँ अपना प्रवाह बढ़ा रही हैं जो एक स्थाई सरकार के लिए खतरा है इन क्षत्रिय दलों के प्रभाब से गठबंधन सरकार को कोई भी बिल संसद में पास करना ही होता है इनके कारन संसद में विपक्षी सांसदों की कम उपस्थिति या मुखबंद प्रक्रिया है अतः हर हाल में संसद सांसदों किउपास्थिति तय होनी चाहिए
इसलिए इस लोकसभा चुनाव में हर मतदाता को अपने मताधिकार का प्रयोग तो करना ही है साथ ही राष्ट्रीय दलों को चुनकर देश को सुदृढ़ पक्ष और विपक्ष देना है ताकि ये विशाल लोकतंत्र सही तौर पर प्रगति कर सके
जय हिंद-जय लोकतंत्र।
द्बारा:-
अवधेश पाण्डेय